
कतरास: आम जनता को त्वरित और निष्पक्ष न्याय देने का दावा करने वाली धनबाद पुलिस की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कतरास थाना द्वारा डाक से आने वाले आवेदनों को बिना खोले ही वापस (Refused/Return to Sender) करने का एक चौंकाने वाला मामला सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आया है। आरटीआई से प्राप्त सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, पिछले महज 3 महीनों के भीतर कतरास पुलिस ने 6 स्पीड पोस्ट आवेदनों को लेने से साफ मना कर दिया।
क्या है पूरा मामला, कैसे खुली पोल?
जानेमाने आरटीआई एक्टिविस्ट अरबिन्द सिन्हा के द्वारा डाक विभाग से मांगी गई एक सूचना के तहत वरिष्ठ डाक अधीक्षक धनबाद मंडल ने बताया कि 01 मार्च 2026 से 10 जून 2026 की अवधि के दौरान कतरास पोस्ट ऑफिस (828113) को कतरास थाना के नाम से कुल 103 स्पीड पोस्ट प्राप्त हुए थे। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से 06 स्पीड पोस्ट लेखों (Articles) को कतरास थाना द्वारा लेने से मना (Refused) कर दिया गया, जिसके बाद डाक विभाग ने उन्हें वापस (RTS) भेज दिया।
जनता का सवाल: बिना खोले कैसे पता चला लिफाफे में क्या है?
इस खुलासे के बाद स्थानीय लोगों और कानून के जानकारों में भारी आक्रोश है। पीड़ितों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति सीधे थाने जाने में असुरक्षित महसूस करता है या थाने में उसकी शिकायत नहीं सुनी जाती, तब वह कानूनन वरिष्ठ अधिकारियों और संबंधित थाने को स्पीड पोस्ट के जरिए अपना लिखित आवेदन भेजता है। ऐसे में कतरास थाना ने लिफाफे को बिना खोले और बिना यह जाने कि उसके अंदर क्या शिकायत या न्याय की गुहार है, उसे लेने से मना (रिफ्यूज्ड) कैसे कर दिया?
थर्ड पार्टी का हवाला देकर स्पीड पोस्ट भेजने वालों के नाम छुपाए
डाक विभाग ने आरटीआई के तहत सूचना उपलब्ध कराते हुए यह स्वीकार किया कि स्पीड पोस्ट के 6 पत्रों को कतरास थाना ने लेने से मना किया, लेकिन तृतीय पक्ष (Third Party) से संबंधित व्यक्तिगत सूचना’ बता कर उन पत्रों को भेजने वाले पीड़ितों के नाम बताने से इनकार कर दिया।
क्या यह एक सोची-समझी कोशिश है?
इस पूरे प्रकरण ने कतरास पुलिस की संवेदनशीलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। मामला उजागर होने के बाद लोगों का कहना है कि अगर पीड़ित डाक के माध्यम से भी अपनी शिकायत थाने तक नहीं पहुंचा पाएंगे, तो उन्हें न्याय कैसे मिलेगा? पुलिस किस नियम के तहत सरकारी डाक या पीड़ितों के पत्रों को लेने से मना कर सकती है? क्या यह पीड़ितों की आवाज को दबाने और थानों में मामलों की संख्या कम दिखाने की एक सोची-समझी कोशिश है?
इस मामले के सामने आने के बाद अब स्थानीय लोगों द्वारा धनबाद के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से इस मामले की जांच करने और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग की जा रही है।
