
कतरास : निरुपमा देवी! यह महज एक नाम नहीं बल्कि जोश, जज्बा और जुनून की एक जीवंत मिसाल है। धैर्य, साहस और संघर्ष का दूसरा नाम है निरुपमा देवी। इन्होंने दशरथ मांझी की तरह बड़ा पहाड़ काटकर कोई रास्ता नहीं बनाया है और ना ही बछेंद्री पाल की तरह माउंट एवरेस्ट की चोटी फतह किया है। झांसी की रानी की तरह अंग्रेजों के दांत भी खट्टे नहीं किए हैं और ना ही इन्होंने कोई विश्व चैंपियन का खिताब जीता है। फिर ऐसा क्या है जो निरुपमा देवी को सबसे अलग और सबसे खास बनाता है। निरुपमा देवी ने पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्र में न केवल नगर निकाय का पार्षद चुनाव जीता है बल्कि वार्ड संख्या 5 में सब को चौंकाते हुए पहली महिला पार्षद बनने का गौरव भी प्राप्त किया है। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि वार्ड संख्या 5 में दो दिग्गज पूर्व पार्षद सहित लगभग 10 से अधिक चुनाव लड़ रहे पुरुष प्रत्याशियों के बीच एकमात्र महिला प्रत्याशी के रूप में न केवल चुनाव लड़ने का साहस किया बल्कि चुनाव जीतकर भी दिखाया। यह जीत इतना भी आसान नहीं रहा। शुरू से लेकर परिणाम आने तक अनगिनत कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने के बाद यह मुकाम हासिल किया।
चुनाव लड़ने का फैसला करना, फिर उस फैसले पर डटे रहकर धैर्य के साथ बिना पीछे मुड़े, बिना परिणाम की चिंता किए धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ते जाना। मन में कुछ कर गुजरने का संकल्प रखकर केवल अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखना ही निरुपमा की सफलता का मूल मंत्र साबित हुआ।

हौसलों का उड़ान भरकर पति के सपने को साकार किया-निरुपमा देवी
19 वर्ष की कम उम्र में ही शादी कर घर परिवार की जिम्मेदारियों को संभाला। 5 वर्षों तक साधारण महिला की तरह घर का चूल्हा चौंकी कर व्यक्तिगत जीवन व्यतीत की। पति सूरज पासवान भारतीय सेना में कार्यरत हैं। निरुपमा देवी बताती हैं कि शुरुआत के दिनों में कुछ समय तक आंगनबाड़ी केन्द्र में पोषण सखी के रूप में कार्य किया। फिर निजी कारण से त्यागपत्र दे दी। इसके बाद पिछले कई सालों से वे लगातार सामाजिक कार्यों, महिला सशक्तिकरण, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता, स्वच्छता एवं जरूरतमंदों की सहायता के लिए सक्रिय रही। उन्होंने कहा कि एक दिन एक साधारण सा हस्ताक्षर कराने के लिए मेरे पति से बिचौलिए ने पैसे की मांग की इतना ही नहीं उस छोटे से काम के लिए 10 दिनों तक परेशान किया। बाद में उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि एवं उनके लोगों के द्वारा गरीब लोगों के हस्ताक्षर जैसे छोटे छोटे कामों को कराने के लिए अनावश्यक रूप से कितना परेशान किया जाता है और उनसे पैसे की मांग भी की जाती है। ये बात मेरे पति को अंदर तक चुभ गई।

उन्होंने मेरे जरिए इस व्यवस्था को बदलने की सोची। मुझे राजनीति में आने को कहा, मैंने इनकार कर दिया। उन्होंने गरीब लोगों की समस्याओ, समाज में फैले कुव्यवस्थाओं से मुझे अवगत कराया। इन समस्याओं से निजात दिलाने को कहा। उन्होंने न सिर्फ मुझे आदेश दिया बल्कि प्रेरणा भी दी। उन्होंने मुझ पर विश्वास जताते हुए कहा कि मैं कर सकती हूं। उन्होंने कभी भी मुझसे कुछ मांगा नहीं हमेशा दिया है। पहली बार उन्होंने मुझसे समाज के लोगों के लिए पार्षद चुनाव लड़ने की बात कही। फिर क्या था मैने भी अपने पति के सपने को साकार करने की ठान ली। अपने हौसले की उड़ान भरकर उनके सपने को पूरा करने की जिद्द ठान ली।

2019 से लगातार लोगों के संपर्क में रही। जनता के दुख को हमेशा अपना दुख समझकर उसे दूर करने का प्रयास किया। लोगों का प्यार और सहयोग मिलता रहा। कुछ लोगों के ताने भी सुनते रहे। पुरुष प्रधान देश में महिला होने का अपमान भी झेला। महिला होने के नाते विरोधियों के द्वारा मुझे कमजोर साबित करने का प्रयास भी हुआ। लेकिन इन सब को नजरअंदाज करते हुए मैने केवल अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया। लोग भी मुझसे जुड़ते चले गए। अंततः जनता जनार्दन ने मुझे पार्षद के रूप में स्वीकार किया और 904 मतों के भारी अंतर से मुझे चुनाव में जीत मिली। हम जनता जनार्दन का तहे दिल से आभार व्यक्त करते हैं।
