पूरी(ओडिशा): पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा भक्ति और आस्था के बीच भव्य रूप से शुरू हो गई। रथों के आगे बढ़ने से पहले सदियों पुरानी ‘छेरा पहरा’ परंपरा का आयोजन हुआ, जिसने लाखों श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इस रस्म के तहत पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने सोने की मूठ वाली झाड़ू से रथ मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई कर भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक होने की परंपरा निभाई।
‘छेरा पहरा’ केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति में सेवा, समानता और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा संदेश देती है कि भगवान के समक्ष राजा और प्रजा सभी समान हैं और सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति भी प्रभु का सेवक होता है। यही कारण है कि रथ यात्रा का यह अनुष्ठान हर वर्ष श्रद्धालुओं के लिए सबसे विशेष और भावनात्मक क्षणों में शामिल रहता है।धार्मिक परंपरा के अनुसार गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव श्री जगन्नाथ मंदिर के ‘प्रथम सेवक’ माने जाते हैं और ‘छेरा पहरा’ की पवित्र रस्म निभाने का अधिकार केवल उन्हें ही प्राप्त है। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए रवाना हुए, जहां वे आठ दिनों तक विराजमान रहेंगे। इसके बाद ‘बहुदा यात्रा’ के जरिए भगवान पुनः श्रीमंदिर लौटेंगे और 27 जुलाई को ‘नीलाद्रि बिजे’ के साथ इस वर्ष की रथ यात्रा का समापन होगा।
धार्मिक परंपरा के अनुसार गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव श्री जगन्नाथ मंदिर के ‘प्रथम सेवक’ माने जाते हैं और ‘छेरा पहरा’ की पवित्र रस्म निभाने का अधिकार केवल उन्हें ही प्राप्त है। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए रवाना हुए, जहां वे आठ दिनों तक विराजमान रहेंगे। इसके बाद ‘बहुदा यात्रा’ के जरिए भगवान पुनः श्रीमंदिर लौटेंगे और 27 जुलाई को ‘नीलाद्रि बिजे’ के साथ इस वर्ष की रथ यात्रा का समापन होगा।